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अतिवर्ती नक्षत्र

 *ॐ नमः शिवाय* *अतिवर्ती नक्षत्र उस स्थिति को कहते हैं जब कोई ग्रह किसी नक्षत्र में अत्यधिक तीव्र गति से प्रवेश करके बहुत कम समय में उसे पार कर जाता है।*  सरल शब्दों में सामान्यतः कोई ग्रह एक नक्षत्र में निश्चित अवधि तक रहता है। लेकिन जब वह अपनी औसत गति से अधिक तेज चलता है और नक्षत्र में टिके बिना शीघ्र निकल जाता है, तो उस नक्षत्र में उसकी स्थिति अतिवर्ती (Ativarti) कहलाती है। ज्योतिषीय विशेषताएँ अतिवर्ती ग्रह फल को जल्दी देता है, परन्तु फल अस्थिर, अचानक या अल्पकालिक होता है। ऐसा ग्रह व्यक्ति के जीवन में अचानक घटनाएँ शीघ्र लाभ या हानि अधूरापन या जल्दबाज़ी मानसिक अस्थिरता जैसे प्रभाव दे सकता है। किन ग्रहों में अतिवर्तन अधिक देखा जाता है  *चन्द्रमा (सबसे अधिक)*  बुध शुक्र कभी-कभी मंगल  *उदाहरण*  यदि चन्द्रमा किसी जन्मकुंडली में किसी नक्षत्र को अत्यंत शीघ्र पार कर रहा हो, तो उस नक्षत्र के स्वामी और कारकत्व के फल व्यक्ति के जीवन में तेज़ी से आते-जाते देखे जाते हैं। शास्त्रीय संकेत अतिवर्ती ग्रह को कभी-कभी  *अल्पफलदायक*  क्षणिक प्रभाव वाला भी कहा गया ह...

KHAR MASA

 *OM NAMAH SHIVAY* *Why is Khar Masa in Sagittarius (Dhanu) only?*  1. Meaning of Khar Māsa Khar = donkey (symbol of weakness/slow movement) Indicates reduced solar strength Period avoided for auspicious beginnings 2. When does Khar Māsa occur? When the Sun transits Sagittarius (Dhanu) Also occurs in Pisces (Mīna) These are the only two signs considered Khar Māsa 3. Why specifically Sagittarius? (a) Astronomical reason Sun moves toward southern declination Sun’s heat and visibility reduce (Northern Hemisphere) Symbolic weakening of solar energy (b) Seasonal reason (Indian context) Marks winter / cold season Agricultural and social activities slow down Nature enters a resting phase (c) Mythological reason Sun’s chariot normally has seven horses During Sagittarius, horses are symbolically replaced by donkeys (khar) Indicates loss of speed, power, and momentum (d) Planetary reason Sagittarius is ruled by Jupiter (Guru) Sun (ego, authority) entering Guru’s sign signifies humility ...

ग्रहों की महादशा तथा अंतर्दशा

 ग्रहों की महादशा तथा अन्तर दशा में प्रदान किए जाने वाले शुभ अथवा अशुभ प्रभाव के कारण __ सूर्य आत्मबल, अहं और सत्ता का ग्रह है। जो व्यक्ति सत्य, धर्म और उत्तरदायित्व से जुड़ा रहता है उसके लिए सूर्य सम्मान, प्रतिष्ठा और नेतृत्व देता है, किंतु अहंकारी, अत्याचारी या कर्तव्यच्युत व्यक्ति के लिए वही सूर्य अपमान, पदहानी और अधिकार से पतन का कारण बनता है। चंद्र मन, भावना और संवेदना का ग्रह है। संतुलित मन, शुद्ध भाव और करुणा रखने वाले के लिए चंद्र मानसिक शांति, लोकप्रियता और भावनात्मक सुरक्षा देता है, परंतु अस्थिर, भयग्रस्त या छलपूर्ण मन वाले व्यक्ति के लिए चंद्र भ्रम, अवसाद और मानसिक अशांति देता है। मंगल साहस, ऊर्जा और कर्म का ग्रह है। अनुशासित, परिश्रमी और संयमित जीवन वाले व्यक्ति को मंगल शक्ति, रक्षा और विजय देता है, जबकि क्रोधी, हिंसक या अव्यवस्थित जीवन शैली वाले व्यक्ति को दुर्घटना, विवाद और शारीरिक कष्ट देता है। बुध बुद्धि, वाणी और विवेक का ग्रह है। सत्यनिष्ठ, अध्ययनशील और स्पष्ट सोच वाले व्यक्ति के लिए बुध सफलता, संवाद-कौशल और व्यावहारिक बुद्धि देता है, किंतु छल, झूठ, चालाकी और गलत त...

पंचक

 *ॐ नमः शिवाय* पांच दिनों के विशेष नक्षत्र संयोग को पंचक कहते हैं। इन पांच दिनों को शुभ और अशुभ कार्यों के लिए देखा जाता है। पंचक के दौरान कुछ कार्य करना बेहद अशुभ माना जाता है। पंचक पंचांग का विशेष भाग है।  *क्या है पंचक* जब चंद्रमा कुंभ से मीन राशि में गुजरता है, तो पंचक का प्रभाव होता है। आमतौर पर इसे पांच महत्वपूर्ण नक्षत्रों में चंद्रमा के गुजरने का समय माना जा सकता है। ये नक्षत्र है - धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, और रेवती। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, या नए निर्माण कार्य से बचना चाहिए। *पंचक अशुभ क्यों माना जाता है?* कहते हैं पंचक के समय किसी तरह के शुभ काम का परिणाम नहीं मिलता है और उस काम को पांच बार करना पड़ता है। हिंदू धर्म में जब किसी की मृत्यु भी पंचक के दौरान होती है, तो विशेष पूजा पाठ करके पंचक की शांति की जाती है। पंचक के दौरान ये काम बिल्कुल ना करें। *धनिष्ठा नक्षत्र:* जरूरी ना हों, तो यात्रा को टालें। गैस, पेट्रोल आदि का काम ना करवाएं। नए घर का वास्तु प्रवेश ना करें। *शतभिषा नक्षत्र:*  इस समय नया बिजनेस शुरू ना कर...

भगवान की भक्ति

 *ॐ नमः शिवाय* *वेदों को कण्ठस्थ करना, तथा वैदिक कर्मकाण्ड करना,भगवान की ही भक्ति है।*  ****************** *पद्मपुराण के,पातालखण्ड के,85 वें अध्याय के,5 वें और छठवें श्लोक में,देवर्षि नारदजी ने,महाराज अम्बरीष जी को,वैशाखमास का माहात्म्य श्रवण कराने के पश्चात,महाराज अम्बरीष को,भक्ति के भेद बताते हुए कहा कि-*  *लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा।* *ध्यानधारणया बुद्ध्या* *वेदानां स्मरणं हि यत्।।5।।*  सूत जी ने कहा कि- हे ऋषियो! भक्ताग्रगण्य महाराज अम्बरीष ने,नारद जी के मुखारविन्द से, वैशाख मास का माहात्म्य श्रवण करने के पश्चात,नारद जी से, भक्तिविषयक प्रश्न करते हुए कहा कि-  हे देवर्षि नारदजी! आप के तो हृदय में,ज्ञान और भक्ति के सहित भगवान नारायण ही निवास करते हैं। ज्ञान और भक्ति के अगाध तत्त्व को जाननेवाले एकमात्र आप ही हैं। आप तो, ज्ञानियों से तथा भक्तों से सर्वदा ही सत्संग करते रहते हैं,तथा भगवान के नाम का संकीर्तन भी निरन्तर करते रहते हैं।  आप तो,ज्ञान और भक्ति,दोनों के विग्रहस्वरूप ही हैं। मैं,आपके मुखारविन्द से,भक्ति के स्वरूप का श्रवण करना चाहता हूं।...

साधक सिद्धियां

 *ॐ नमः शिवाय* *-सच्ची तथा सही साधक की सिद्धियाँ-* कोई भी साधक अपने इष्ट के निरंतर नाम जप से यहीं अनुभूति का आभास करता है  १- शरीर में हल्कापन और मन में उत्साह होता है । २- शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती है । ३- त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है । ४- तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्त्विक दिशा में मन लगने लगता है । ५- स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है । ६- नेत्रों में तेज झलकने लगता है । ७- किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है, तो उसके सम्बन्ध में बहुत-सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिभासित होती हैं, जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती हैं। ८- दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती । ९ - भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्वाभास मिलने लगता है । १० - शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है। आचार्य दीपक सिक्का  संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी 

गौ, तुलसी और पीपल की प्रदक्षिणा करने से, तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है।

 *ॐ नमः शिवाय* *गौ,तुलसी,और पीपल की प्रदक्षिणा करने से, तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है।*  ******************   *पद्मपुराण के,स्वर्गखण्ड के,40 वें अध्याय के,9 वें श्लोक में,नारद जी ने, धर्मराज युधिष्ठिर को,गौ,तुलसी तथा अश्वत्थ अर्थात पीपल के वृक्ष का माहात्म्य बताते हुए कहा कि-*   *अश्वत्थस्य तुलस्याश्च गवां कुर्यात् प्रदक्षिणाम्।*   *सर्वतीर्थं फलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते।।*  प्रत्येक धार्मिक स्त्री पुरुषों को,अपने जीवन के कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। शास्त्रों में, प्रत्येक स्त्री पुरुष के कर्तव्यों का वर्णन है।  हमको क्या करना चाहिए,यदि यही ज्ञान नहीं है तो,ऐसे अनभिज्ञ धार्मिक स्त्री पुरुष तो अपनी स्वेच्छा से,अथवा किसी अन्य अज्ञानी धार्मिक स्त्री पुरुषों की क्रिया को देखकर कुछ भी असावधानी पूर्वक करते रहेंगे,तो सत्कर्म का जैसा फल प्राप्त होना चाहिए था,जितना फल प्राप्त होना चाहिए था,तथा जितने समय में फल प्राप्त होना चाहिए था,वह फल प्राप्त नहीं होने पर,अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। यदि एकबार अश्रद्धा और अविश्वास हुआ तो, धार्मिक कर्म करने क...

धनु राशि में अमावस्या

 *धनु राशि में अमावस्या* चंद्रमा धनु राशि के प्रारंभ में सूर्य से युति करता है, मूल नक्षत्र में।  ‘मूल’ का अर्थ है जड़—जो हमारे ब्रह्मांडीय उद्गम (इस राशि के माध्यम से देखे जाने वाले आकाशगंगा केंद्र) और हमारे व्यक्तिगत व सामूहिक पारिवारिक तथा प्रजातीय मूलों की ओर संकेत करता है। जैसे-जैसे हम छुट्टियों के समय में प्रवेश करते हैं और उन रिश्तेदारों से पुनः जुड़ते हैं जिनसे पूरे वर्ष भेंट नहीं हो पाती, ये विषय अक्सर उभरकर सामने आते हैं। मूल नक्षत्र हमें बातों की जड़ तक पहुँचने में सहायता करता है और उन लंबे समय से जमी मान्यताओं को उजागर करता है जिन्हें छोड़ने की आवश्यकता होती है।  इसका प्रतीक—जड़ों का गुच्छा—उपचार की ओर भी संकेत करता है, विशेषकर औषधियों (जड़ी-बूटियों) के माध्यम से।  यह ऐसा समय है जब पारिवारिक घाव भर सकते हैं, किंतु यह प्रक्रिया गहरी पीड़ा भी ला सकती है, क्योंकि दबी हुई बातें सामने आती हैं। मूल नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता निरृति हैं—‘विनाश की देवी’—जो हमें स्मरण कराती हैं कि सत्य के मार्ग में जो भी बाधक है, उसे हटाया जाना चाहिए।  याद रखें कि हर व्यक्ति ...

गुलिक उपग्रह

 *ॐ नमः शिवाय*  *गुलिक उपग्रह* शनि का अंधकारमय संतान: गुलिक आपके घर और आपके कर्म में कैसे बैठता है कुछ जन्मकुंडलियों में एक बहुत अजीब तरह की छाया होती है। जीवन चलता रहता है, लेकिन परिवार की कहानी में अस्पताल की गंध, अंतिम संस्कार, रक्त जाँच, और स्वास्थ्य संबंधी डर बार-बार लौटते रहते हैं। आचार्य मन्त्रेश्वर इस छाया को गुलिक और मांडी कहते हैं — शनि की संतान — राहु और केतु जितनी ही कठोर, जो हमेशा सूर्य और चंद्रमा (जीवन देने वाले) को विचलित करती रहती हैं। जब गुलिक या मांडी किसी भी भाव को तीव्र रूप से स्पर्श करते हैं, तो जीवन का वह क्षेत्र दूषित या असुरक्षित सा महसूस होने लगता है। यदि वे चतुर्थ भाव को छुएँ, तो व्यक्ति बार-बार घर बदलता है, या घर बीमारी और तनाव से भारी हो जाता है। यदि वे लग्न या चंद्रमा के साथ हों, तो शरीर उम्र से पहले थका-थका लगता है, बीमारी से अधिक बीमारी का डर बना रहता है, नींद टूटती है, सपने अजीब होते हैं। यदि वे सप्तम या अष्टम भाव पर आक्रमण करें, तो आसपास के करीबी लोगों में ऑपरेशन, दुर्घटनाएँ, अचानक हानियाँ सुनने को मिलती रहती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि “आपकी मृत...

वैदिक देवता : स्वरूप, वर्गीकरण और प्रमुख विशेषताएं

 *वैदिक देवता : स्वरूप, वर्गीकरण और प्रमुख विशेषताएँ*  वैदिक देवता भारतीय संस्कृति और धर्म का आधार हैं। वेदों में देवताओं का उल्लेख दिव्य शक्तियों के रूप में किया गया है, जो प्राकृतिक शक्तियों, जीवन-मूल्यों और ब्रह्मांडीय व्यवस्थाओं के प्रतीक हैं। देवता केवल पूजा के पात्र नहीं, बल्कि वेदों की ऋचाओं में मानव-रूप में चित्रित ऐसे आदर्श हैं, जिनके माध्यम से मानवता को दिशा, प्रेरणा और सुरक्षा मिलती है। देवता की परिभाषा  देवता किसी दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। देव वह है- जो कुछ देते हैं (दाता)। जो स्वयं प्रकाशमान हैं। जो दूसरों को प्रकाशमान करते हैं। जिनमें असाधारण और दिव्य शक्ति है। जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। यक्ष के अनुसार, जो लोकों में भ्रमण करते हैं, प्रकाशित होते हैं, और जीवन के सुख-साधनों को प्रदान करते हैं, वे देवता कहलाते हैं।  वेदों में देवताओं को प्राणी के रूप में, मानवीय रूप देकर प्रस्तुत किया गया है तथा प्रत्येक देवता का प्रकृति के किसी तत्व से संबंध जोड़ा गया है, जैसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा, मेघ आदि। वैदिक देवताओं का वर्गीकरण ...

प्रश्न कुंडली के महत्वपूर्ण बिंदु

 ॐ नमः शिवाय। प्रश्न कुंडली में देखा जाए तो सभी ग्रह और भाव महत्वपूर्ण हैं परंतु चंद्रमा की स्थिति और चंद्रमा किस भाव में है ये विशेष महत्व रखता है।  अतः प्रश्न कुंडली में चंद्रमा पर सभी रिजल्ट्स अत्यंत निर्भर करते हैं।  चंद्रमा मन का कारक है और याद रखें प्रश्न सदैव मन से ही उत्पन्न होता है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु बुद्ध ग्रह है जो कि वाणी का कारक है।  मन द्वारा उत्पन्न प्रश्न को आप वाणी के द्वारा कितना स्पष्ट कर पाएंगे ये बुद्ध की स्थिति पर निर्भर है। तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु गुरु है क्योंकि गुरु आकाश तत्व है और आकाश तत्व के द्वारा ही हम श्रवण करते हैं। आपके द्वारा व्यक्त प्रश्न को सामने वाला कितनी स्पष्टता से सुन पाएगा या ग्रहण कर पाएगा ये गुरु की स्थिति पर निर्भर है। आचार्य दीपक सिक्का संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी

प्रत्येक भाव कुछ नहीं अपितु बहुत कुछ कहता है (भाग ३)

 ॐ नमः शिवाय। प्रत्येक भाव कुछ नहीं अपितु बहुत कुछ कहता है। आज बात करते है तृतीय भाव की। तृतीय भाव यानि पराक्रम, मेहनत, कम्युनिकेशन स्किल्स, छोटे भाई बहन, पड़ौसी, डॉक्यूमेंट्स, छोटी यात्राएं और खेल कूद तृतीय भाव से संबंधित है। परंतु तृतीय भाव और भी बहुत कुछ बताता है ✓जैसे कि आपके लग्न (प्रथम भाव) का पराक्रम, कम्युनिकेशन स्किल्स और आपके छोटे भाई बहन एवं उनके साथ संबंध है तृतीय भाव  ✓आपके संचित धन और परिवार (२ भाव) का मल्टीप्लिकेशन है तृतीय भाव, क्योंकि जितना पराक्रम होगा उतना ही धन संचित होगा और जितना अपनो से संबंध अच्छा रहेगा उतना ही परिवार में प्रेम और सद्भाव बना रहेगा। तो दूसरे भाव की वृद्धि के लिए तीसरे भाव का उपयोग ज़रूरी है। अतः दूसरे भाव कि वृद्धि है तीसरा भाव। ✓आपके सुखों (४ भाव) की हानी या व्यय है तीसरा भाव, क्योंकि मेहनत करने में सुख कहां। जब आप तीसरे भाव के कार्यकत्वों को प्राप्त करने जाओगे तब आपका चौथा भाव कहीं न कहीं संघर्षरत हो जाएगा। जैसे पड़ौसी से अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए आपको अपने घर (४  थे भाव) पर कोई न कोई समझौता करना पड़ेगा, मेहनत करोगे तो आपको अपने घ...