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शिव का स्वरूप

ॐ नमः शिवाय  शिव का स्वरूप:- √•शिव परम वैष्णव हैं, सबके गुरु हैं, ज्ञानदाता हैं। शिव की जय हो। ज्ञान गंगा का प्रवाह शिव-पार्वती के संवाद के रूप में अनादि काल से चला आ रहा है। ज्ञान की इस गंगा में स्नान करने वालों की जय हो। इस गंगा के तट पर मैं रह रहा हूँ। यह गंगा पाखण्डियों पापियों के स्पर्श से दूषित होती रहती है। साधु-सन्तों के मज्जन करने से यह शुद्ध होती रहती है। इस शुद्ध गंगा के जल का पान करने वालों को मैं प्रणाम करता हूँ। जिसके भीतर यह गंगा है, वह गुरु है। जिसके सिर पर यह गंगा है, वह गुरु है जिसके मुख में यह गंगा है, वह गुरु है जिसकी आँखों में यह गंगा है, वह गुरु है ऐसे गुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।  √• [गुरु मुख में नाद (शब्द) है। गुरु मुख में वेद (ज्ञान) है। गुरु मुख में सब विश्व समाया हुआ है। गुरु ईश्वर है। गुरु गोरस (गंगा) है। गुरु ब्रह्मा है। गुरु माता पार्वती (मूल प्रकृति) है ।]  √•परम गुरु ज्ञान वृद्ध होता है। उसकी देह दिव्य होती है। वह सतत युवा होता है। वह मौन उपदेश करता है। वृद्ध शिष्यगणों का संशय नष्ट करने में वह समर्थ होता है। "चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः...

बुध ग्रह के उपाय

ॐ नमः शिवाय  बुध के उपाय, श्री विष्णुसहस्रनामावली और श्री विष्णु के विभिन्न अवतारों का remedies में कैसे उपयोग होता है:  विभिन्न संयोजन बुध के दोष या ग्रह दोष तब उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति धोखाधड़ी में शामिल होता है या बच्चों से शत्रुता या दूसरों की संपत्ति के गलत इस्तेमाल के कारण ऐसा होता है। इसके प्रभाव से भ्रम, बच्चों पर असर और मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं। इन दोषों को दूर करने के लिए श्री विष्णु की पूजा की जाती है। हालांकि, उपाय सुझाने से पहले कुंडली का बहुत गहन विश्लेषण आवश्यक होता है, अन्यथा उपाय काम नहीं करते। 1. जब बुध मंगल से पीड़ित हो और अग्नि तत्व वाले क्षत्रिय राशियों में हो, तब व्यक्ति को श्री नरसिंहसहस्रनामावली का पाठ श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली के साथ करना चाहिए। यही उपाय तब भी किया जाता है जब बुध अग्नि तत्व राशि में पीड़ित हो। 2. जब बुध पूर्ण ब्राह्मण राशियों में पीड़ित हो या जब कालचक्र दशा उस राशि की हो जहाँ बुध स्थित है और वह ब्राह्मण राशि हो, तब श्री विष्णुसहस्रनामावली का पाठ लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनामावली के साथ किया जाना चाहिए। यह तब करना चाहिए जब बुध खर...

जन्म कुंडली और मनुष्य के 5 विकार मोह और ज्योतिष

ॐ नमः शिवाय  जन्म कुंडली और मनुष्य के 5 विकार मोह और ज्योतिष भारतीय दर्शन और शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य के भीतर पांच मुख्य विकार होते हैं— काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। हमारी इस विशेष श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने काम, क्रोध और लोभ को डिकोड किया था। आज इस श्रृंखला का चौथा भाग है: मनुष्य को सबसे गहराई में बांधने वाला विकार — मोह । मोह एक ऐसा मायाजाल है जो हमें यह भ्रम देता है कि जो हमारा है, वह हमेशा हमारा ही रहेगा। यह सत्य को देखने की हमारी दृष्टि को धुंधला कर देता है। जब मोह की बात आती है, तो महाभारत के 'धृतराष्ट्र' से बड़ा कोई उदाहरण नहीं है। उनका अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति ऐसा अंधा मोह था कि उन्हें धर्म-अधर्म, सही-गलत कुछ दिखाई नहीं दिया। इसी मोह ने अंततः पूरे कुरुवंश का सर्वनाश कर दिया। क्रोध और लोभ व्यक्ति को भटकाते हैं, लेकिन 'मोह' व्यक्ति को जड़ों से ही अंधा कर देता है। वात्सल्य  और मोह  के बीच की वो बहुत बारीक रेखा अक्सर लोग अपने परिवार या बच्चों के प्रति 'मोह' को 'प्रेम' या 'वात्सल्य' समझ बैठते हैं, लेकिन इन दोनों में ज़मीन-आसमान ...

विमशोत्तरी एवं षोडशोत्तरी दशाएं

ॐ नमः शिवाय  पराशर मत — विंशोत्तरी एवं षोडशोत्तरी दशा में लग्न अनुसार 3 नक्षत्रों में विशेष अशुभ (ग्रन्थ प्रमाण सहित) मूल सिद्धान्त (पराशर नियम) • दशा चयन जन्म नक्षत्र एवं विशेष योग से होता है। • नक्षत्र फल उसके स्वामी ग्रह से। प्रमाण — Brihat Parashara Hora Shastra श्लोक — “नक्षत्राधिष्ठिता दशा जन्मकाले प्रवर्तते” • षोडशोत्तरी दशा — विशेषतः होरा लग्न / सूर्य प्रभाव से लागू। श्लोक — “रवौ बलिनि षोडशोत्तरी दशा विधीयते” ________________________________________ १. मेष लग्न (अश्विनी-भरणी-कृत्तिका) • विंशोत्तरी लागू → भरणी अशुभ (शुक्र = 2,7 मारकेश) • षोडशोत्तरी लागू → कृत्तिका (सूर्य तीक्ष्ण कर्मफल) ________________________________________ २. वृषभ लग्न (कृत्तिका-रोहिणी-मृगशीर्ष) • विंशोत्तरी → मृगशीर्ष (मंगल = 7,12 पाप) • षोडशोत्तरी → कृत्तिका (सूर्य 4 स्वामी कठोर फल) ________________________________________ ३. मिथुन लग्न (मृगशीर्ष-आर्द्रा-पुनर्वसु) • विंशोत्तरी → पुनर्वसु (गुरु = 7 मारक) • षोडशोत्तरी → आर्द्रा (राहु तीव्र परिणाम) ________________________________________ ४. कर्क लग्न (पु...