विमशोत्तरी एवं षोडशोत्तरी दशाएं

ॐ नमः शिवाय 


पराशर मत — विंशोत्तरी एवं षोडशोत्तरी दशा में लग्न अनुसार 3 नक्षत्रों में विशेष अशुभ (ग्रन्थ प्रमाण सहित)

मूल सिद्धान्त (पराशर नियम)

• दशा चयन जन्म नक्षत्र एवं विशेष योग से होता है।

• नक्षत्र फल उसके स्वामी ग्रह से।

प्रमाण — Brihat Parashara Hora Shastra

श्लोक —

“नक्षत्राधिष्ठिता दशा जन्मकाले प्रवर्तते”

• षोडशोत्तरी दशा — विशेषतः होरा लग्न / सूर्य प्रभाव से लागू।

श्लोक —

“रवौ बलिनि षोडशोत्तरी दशा विधीयते”

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१. मेष लग्न (अश्विनी-भरणी-कृत्तिका)

• विंशोत्तरी लागू → भरणी अशुभ (शुक्र = 2,7 मारकेश)

• षोडशोत्तरी लागू → कृत्तिका (सूर्य तीक्ष्ण कर्मफल)

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२. वृषभ लग्न (कृत्तिका-रोहिणी-मृगशीर्ष)

• विंशोत्तरी → मृगशीर्ष (मंगल = 7,12 पाप)

• षोडशोत्तरी → कृत्तिका (सूर्य 4 स्वामी कठोर फल)

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३. मिथुन लग्न (मृगशीर्ष-आर्द्रा-पुनर्वसु)

• विंशोत्तरी → पुनर्वसु (गुरु = 7 मारक)

• षोडशोत्तरी → आर्द्रा (राहु तीव्र परिणाम)

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४. कर्क लग्न (पुनर्वसु-पुष्य-आश्लेषा)

• विंशोत्तरी → पुष्य (शनि 7,8 स्वामी)

• षोडशोत्तरी → आश्लेषा (बुध 3,12 कष्ट)

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५. सिंह लग्न (मघा-पूर्वाफाल्गुनी-उत्तराफाल्गुनी)

• विंशोत्तरी → पूर्वाफाल्गुनी (शुक्र अशुभ)

• षोडशोत्तरी → मघा (केतु तीक्ष्ण कर्मफल)

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६. कन्या लग्न (उत्तराफाल्गुनी-हस्त-चित्रा)

• विंशोत्तरी → चित्रा (मंगल 3,8 स्वामी)

• षोडशोत्तरी → हस्त (चन्द्र 11 स्वामी)

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७. तुला लग्न (चित्रा-स्वाति-विशाखा)

• विंशोत्तरी → चित्रा (मंगल 2,7 मारकेश)

• षोडशोत्तरी → स्वाति (राहु अस्थिर फल)

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८. वृश्चिक लग्न (विशाखा-अनुराधा-ज्येष्ठा)

• विंशोत्तरी → अनुराधा (शनि पाप प्रभाव)

• षोडशोत्तरी → ज्येष्ठा (बुध 8,11 स्वामी)

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९. धनु लग्न (मूल-पूर्वाषाढ़ा-उत्तराषाढ़ा)

• विंशोत्तरी → पूर्वाषाढ़ा (शुक्र 6,11 स्वामी)

• षोडशोत्तरी → मूल (केतु मूलकर्म फल)

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१०. मकर लग्न (उत्तराषाढ़ा-श्रवण-धनिष्ठा)

• विंशोत्तरी → धनिष्ठा (मंगल संघर्षकारक)

• षोडशोत्तरी → श्रवण (चन्द्र मारक सम्बन्ध)

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११. कुम्भ लग्न (धनिष्ठा-शतभिषा-पूर्वभाद्रपद)

• विंशोत्तरी → पूर्वभाद्रपद (गुरु 2,11 मारक)

• षोडशोत्तरी → शतभिषा (राहु तीक्ष्ण)

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१२. मीन लग्न (पूर्वभाद्रपद-उत्तरभाद्रपद-रेवती)

• विंशोत्तरी → रेवती (बुध 7 स्वामी मारक)

• षोडशोत्तरी → पूर्वभाद्रपद (गुरु द्वितीय प्रभाव)

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शास्त्रीय निष्कर्ष (पराशर सिद्धान्त)

• दशा बदलने से अशुभ नक्षत्र भी बदल सकता है।

• विंशोत्तरी → चन्द्राधारित कर्मफल।

• षोडशोत्तरी → सूर्य/होरा बल आधारित फल।

• अतः एक ही लग्न में अलग दशा लागू होने पर अलग नक्षत्र अधिक अनिष्टकारी बनता है।

पराशर सिद्धान्त — पक्ष, होरा लग्न और 120-116 वर्ष दशा का वास्तविक नियम (ग्रन्थ आधार)

प्रमाण ग्रन्थ — Brihat Parashara Hora Shastra

श्लोक सिद्धान्त —

“दशाभेदाः कालभेदात् प्रवर्तन्ते न संशयः”

अर्थ — कालभेद (पक्ष, बल, योग) से दशा बदलती है।

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१. शुक्ल पक्ष जन्म → चन्द्र होरा प्रधान → 120 वर्ष दशा

पराशरी नियम

• शुक्ल पक्ष में चन्द्र बलवान।

• चन्द्र होरा या चन्द्रप्रधान लग्न स्थिति।

• तब चन्द्राधारित दशा स्वीकार।

फल

➡ विंशोत्तरी दशा (120 वर्ष) लागू।

शास्त्रीय आधार —

“चन्द्रबलसमायुक्ते विंशोत्तरी प्रशस्यते”

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२. कृष्ण पक्ष जन्म → सूर्य होरा (सिंह प्रकृति) → 116 वर्ष दशा

नियम

• कृष्ण पक्ष में सूर्य प्रभाव प्रमुख।

• सूर्य होरा / सिंहादि अग्नि प्रभाव।

फल

➡ षोडशोत्तरी दशा (≈116 वर्ष भोग आयु) लागू।

श्लोक —

“रवौ बले षोडशोत्तरी दशा विधीयते”

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३. दशा बदलने से नक्षत्राधिपति प्रभाव भी बदलता है

पराशर सिद्धान्त —

“यस्यां दशायां ग्रहाधिपत्यं तस्यैव फलनिर्णयः”

अर्थ

• जो दशा लागू होगी उसी क्रम के ग्रह फल देंगे।

• इसलिए नक्षत्र स्वामी का फल भी दशा प्रणाली पर निर्भर।

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४. क्यों कुंडली में केवल विंशोत्तरी नक्षत्र स्वामी लिखना अपूर्ण

कारण

• आधुनिक सॉफ्टवेयर जन्म नक्षत्र → स्वतः विंशोत्तरी मान लेते हैं।

• पराशर ने दशा चयन शर्ताधीन बताया है।

अतः —

✔ नक्षत्र स्वामी स्थिर नहीं

✔ दशा बदलने पर फलाधिपत्य की व्याख्या बदलती है।

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५. नक्षत्र मैत्री (कुण्डली मिलान) पर प्रभाव

पराशरी तर्क

• गुण मिलान में नक्षत्र स्वामी आधार।

• यदि वास्तविक दशा अलग हो → ग्रहाधिपत्य सम्बन्ध बदलता है।

फल

• नक्षत्र मैत्री गलत आंकी जा सकती है।

• विशेषतः जब षोडशोत्तरी लागू हो पर विंशोत्तरी मान ली जाए।

शास्त्रीय सिद्धान्त —

“अयुक्ते दशानिर्णये फलभ्रंशो न संशयः”

(पराशरी दशा निर्णय परम्परा)


आपका अपना 

आचार्य दीपक सिक्का 

संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी 

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