शनि केतु युति मेरी नज़र से
ॐ नमः शिवाय
शनि केतु की युति
शनि और केतु का योग। मेरे विचार से इस योग में बहुत कुछ है।
संघर्ष है तो ज्ञान भी है अध्यात्म भी है।
विरक्ति है तो आसक्ति भी है।
इस योग के दो पहलू हैं:—
१) सांसारिक
२) आध्यात्मिक
सांसारिक पहलू को देखें तो ये काफी संघर्ष कराता है, कार्यक्षेत्र में बाधाएं उत्पन्न करता है, कोई भी कार्य बिना विघ्न के पूरा नहीं होता और कभी कभी तो पूरा होता ही नहीं। जिस भाव में बन जाए उस भाव से संबंधित रिश्ते नातों में तनाव और विच्छेद दे देता है। विरक्त बना देता है, अकेलापन दे देता है।
लेकिन वहीं अगर हम अध्यात्म के दृष्टिकोण से देखें तो कहना ही क्या। अत्यंत शुभ योग बन जाता है। कर्म के स्वामी शनि के साथ विरक्ति और मोक्ष के स्वामी केतु का मिलन ऐसा लगता है मानो भक्ति (कर्म) में लीन होकर अपने शिव (मोक्ष) को प्राप्त कर लिया हो।
उच्च कोटि का आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान कर ज्ञानी बना देता है ये योग, जीवन की कला सीख देता है ये योग, मनुष्य के एकमात्र ध्येय शिव से मिलन कराता है, और तो और उच्च कोटि का विद्वान, ज्योतिष, भविष्य वक्ता बना देता है। महा ध्यानी बना देता है। आत्मा का संगम परमात्मा से करा देता है।
क्या जादुई योग है भाई। मान गए।
सारांश ये है कि अगर सांसारिक रूप में देखें तो संघर्ष, विलम्ब, विघ्न, एकांत और रिश्ते नातों से विरक्ति देता है परंतु अगर आध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखे तो ज्ञान, ध्यान, साधना, मोक्ष और प्रभु से आसक्ति भी यही योग देता है।
आचार्य दीपक सिक्का
संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी
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