शुक्र मंगल युति मेरी नज़र से
ॐ नमः शिवाय
शुक्र—मंगल युति
मंगल को अग्नि और तेज का प्रतीक माना गया है। शरीर में रक्त पर मंगल का प्रभाव होता है। शारीरिक बल और शारीरिक ऊर्जा भी मंगल के कार्यक्षेत्र में आती है। मंगल धैर्य और जल्दबाजी भी देता है।
वहीं शुक्र जल और कोमलता का प्रतीक है। शुक्र सौंदर्य, प्रेम, वासना, काम, यौन इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।
जब इन दोनों ग्रहों का मिलन होता है तो इनके गुणधर्मों के अनुसार व्यक्ति में काम वासना बलवती हो जाती है। कुंडली के अलग-अलग भावों के अनुसार इनके फल में कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन मूलत: यह व्यक्ति को अत्यंत कामी बनाता है। ऐसे व्यक्ति विपरीत लिंग के प्रति अत्यंत आकर्षित रहते हैं। निर्णय लेने में जल्दबाजी होने के कारण ये उचित और अनुचित का भेद नहीं कर पाते। धैर्यहीनता होने की वजह से ये अत्यंत उग्र और कामी हो जाते हैं और कुछ अनुचित कर बैठते हैं।
शुक्र मंगल की युति किसी भी भाव में हो तो जातक, काम पीड़ित होता है । यदि यह युति पंचम, सप्तम, नवम भाव में हो तथा पाप दृष्ट हो तो अत्यंत कष्टकारी होती है किसी शुभ ग्रह की दृष्टि होने पर इसमें कुछ कमी आ सकती है।
कामवासना के अतिरिक्त ऐसे जातकों में चर्म रोग एवं गुप्त रोग होने की भी प्रबल संभावनाएं बनती हैं। ऐसे व्यक्ति कला के क्षेत्रों में भी आकर्षित होते हैं और मौका मिलने पर अच्छा प्रदर्शन करते हैं। खास तौर पर नृत्य कला, चित्र कला और नाट्य कला। अर्थात् जहां शारीरिक रूप से अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हो।
आचार्य दीपक सिक्का
संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी
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