मंगल दोष

ॐ नमः शिवाय 


मंगल दोष


लग्न कुंडली में जब मंगल १, ४, ७, ८, १२ भाव में उपस्थित हो तब मंगल दोष या कुजा दोष कहलाता है।


कुछ विद्वान जन २ भाव में मंगल होने को भी मंगल दोष मानते है।


 मंगल दोष को ३ प्रकार से देखा जाता है लग्न कुंडली से, चंद्र कुंडली से और शुक्र से।


लग्न से मांगलिक होने पर स्वास्थ्य हानि, चंद्र से मांगलिक होने पर मानसिक मतभेद, चिंता, डर, मानसिक तनाव, मानसिक हानि एवं शुक्र से मांगलिक होने पर सर्वहानी कहा गया है। 


सर्वहानी का अर्थ है तन, मन, धन, रिश्ता, आपसी संबंध, प्रेम आदि सभी की हानि होती है। इसीलिए शुक्र से मांगलिक सबसे घातक बताया गया है। 


यदि तीनों स्थितियों में मंगल की स्थिति १, ४, ७, ८, १२ भावो में आ रही हो तो जातक प्रबल मांगलिक माना जाता है।


मंगल दोष परिहार


१) मंगल स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हो

२) मंगल अंश बल में कमज़ोर हो अर्थात या तो शून्य अंश से छः अंश के बीच हो या फिर २४ अंश से ३० अंश के बीच हो।


३) मंगल अस्त हो

४) मंगल पर गुरु या शनि की दृष्टि हो। यहां एक बात बताना चाहूंगा कि शनि मंगल का शत्रु है अतः मंगल के प्रभाव को कम करता है।

५) यदि १, ४, ७, ८, १२ में शनि और मंगल की युति हो।

६) यदि सप्तमेश बली हो, सप्तम भाव में ही स्थित हो, सप्तम भाव सप्तमेश से दृष्ट हो।

७) यदि मंगलिक जातक के जीवनसाथी की कुंडली में शनि बलवान हो तो मंगल दोष जा परिहार हो जाता है।

८) कुछ विद्वान ये भी मानते हैं कि यदि जातक का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से हो जाए जिसकी कुंडली में ३, ६, ११ भाव में शनि, राहु या मंगल में से कोई एक ग्रह बैठा हो तब भी जातक का मांगलिक दोष प्रभावहीन हो जाएगा।


आचार्य दीपक सिक्का 

संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी 

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